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खबरों की कबर . . . साफा और हेलमेट रैली से महिला सुरक्षा ?

साफा और हेलमेट रैली से महिला सुरक्षा ?
जिले के ग्रामीण और आदिवासी अंचल के सुदूर क्षेत्रों से लेकर जिला मुख्यालय के पाँश इलाकों में महिलाएं और बच्चियां असुरक्षित है। महिलाओं व बच्चियों के साथ हरकत करने वालों में किसी भी सरकारी ऐजेंसी का खौफ नही है। बीते दिनों प्रदेश की राजधानी से लेकर जिला मुख्यालय रतलाम तक में बच्चियों के साथ अत्याचार बढ़े तो महिला सुरक्षा अभियानों की बाढ़ आ गई।
पुलिस और महिला एवं बाल विकास विभाग के घरों में तो मानों ब्याह जैसी तैयारियां थी। बीते दिनों कलेक्टर कार्यालय से महिलाओं की साफा वाहन रैली तो थाना स्टेशन रोड़ परिसर से हेलमेट रैली निकाल दी गई। जाहिर है ऐसी सरकारी खबरे छपना और दिखाई ही जाना थी, जो पढ़ और देख ली गई। जिम्मेदारों ने खुद ही अपनी पीठ थपथपा ली। इस तरह की खबरे और दिखावे के लिए यहां वहां होने वाले जागरुकता कार्यक्रमों से उन महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा नही हो पाती जो सुदूर ग्रामीण या आदिवासी अंचलों में शिक्षा छोड़ कर अपने परिवार के साथ मजदूरी करती है या भेड़-बकरिया चराती आ रही है।
विचारणीय ये भी है कि इन सरकारी दिखावे से क्या ग्रामीण और आदिवासी अंचल में बकरी या गाय चरा रही बच्चियों के आए दिन होने वाली हरकते रुक जाएगी? आज भी कई मां-बाप थानों और प्रशासन की जनसुनवाईयों में अपनी लापता बच्चियों को ढूंढने की गुहार लगाते आ रहे है। बीते दिनों निजी स्कूल में हुई घटना शर्मनाक है, इसके पहले भी एक समय के नकली सिंघम के कार्यकाल में मित्र निवास रोड़ स्थित एक बड़े निजी स्कूल में बच्ची को ज्यादति का शिकार होना पड़ा था, जिसके विरोध में माननीय वकीलों ने रात भर न्यायालय खुला रखा था।
भटकते युवाओं के रास्ते पर लाने और बच्चियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उन युवा नेताओं की भी है जो भगतसिंह आदि की जंयती पर रैलिया निकाल कर अपनी राजनीति चमकाते है, और बच्चियों को अगवा करने वालों की तरफदारी या माण्वाली करते आ रहे है।
बहरहाल, अब नवरात्र पर्व समाप्त हो चुका है, और महिला और बालिका सुरक्षा को लेकर शासन स्तर से मिले टारगेट को भी संबधित विभागों ने पूरा कर दिया है। भोपाल की पुरानी फेक्ट्री में एमडी की जखीरा मिलने के बाद तस्करों की धरपकड़ का काम आने वाले दिनों में शुरु हो ही जाएगा। जिस तरह हर हादसे, घटना, वारदात आदि तरह के अपराध के बाद इन्हे रोकने या जागरुकता के लिए अभियान चलाए जाते है, उसी तरह जिले और प्रदेश की महिला सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों को रफा दफा करने के लिए महिला सुरक्षा को लेकर भी अभियानों की शुरुवात हो चुकी है। हम अपनी बर्बादी का मंजर यू देखते रहे, कांरवा गुजर गया गुबार देखते रहे।
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ड्रग्स और देशी कट्टों के व्यापारी सरपंच से बचाओं..
मादक पदार्थो के साथ ही देशी कट्टों सहित अन्य हथियारों का कारोबार कर लोगों की जमीनों पर अवैध तरीके से कब्जा करने वाले एक सरपंच इन दिनों खासा चर्चा में बना हुआ है। बीते दिनों जिला प्रशासन के समक्ष एक महिला ने शिकायत कर गुहार लगाई है, कि अपने क्षेत्र में आंतक का पर्याय बन चुके सरपंच से इन्हे बचाया जाए।
आलोट स्थित कृषि मंडी के समीप रहने वाली ममता सुनील कुमार पोरवाल ने शिकायत दर्ज कराई है कि ग्राम तालौद का सरपंच सुरेश पोरवाल अवैध रुप से हथियार, अफीम, गांजा आदि का व्यापार करते हुए लोगों की जमीनों पर कब्जा करता आ रहा है। प्रार्थिया ममता की पेतृक संपत्ति कृषि भूमि ग्राम तालौद स्थित हनुमान मंदिर के पास है। सुनील इस भूमि पर कब्जा करना चाहता है, और सीमाकंन करने आए पटवारी आदि अमले को भी धमकी देकर मौके से भगा देता है।
ममता ने प्रशासन से गुहार लगाई है कि गुंडे सरपंच पर कार्रवाई कर हमारी जमीन को कब्जे से मुक्त कराई जाए।
मेले में झमेला और रावण भी ढीला
लगभग 50 लाख की लागत से नगर निगम द्वारा आयोजित नवरात्र मेला और रावण दहन कार्यक्रम लगभग फ्लाप शो ही साबित हुए है। ऐसे में दर्शकों को भी निराशा हाथ लगी है। नवरात्र मेले में ठेले दुकान आदि लगाने का कार्य राजस्व शाखा के ऐसे अपरिपक्व हाथों को सौपा गया, जो पहले ही अपने कारनामों के लिए ख्यात और कुख्यात है। सांस्कृतिक मंच पर रंगारंग कार्यक्रमों की प्रस्तुति भी लगभग नीरस ही नजर आई। मेले की भारी असफलता की कसर रावण दहन कार्यक्रम ने पूरी कर दी और बगैर लंका के ही रावण का दहन अग्निबाण की बजाय मशाल और ज्वलशील पदार्थ छिडक़ के कर दिया गया।
आरटीआई लगा दूंगा ….
वर्ष 2005 से लागू सूचना का अधिकार अधिनियम का मूल उद्देश्य नागरिकों को सशक्त बनाने, सरकार के कार्य में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देना, भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना और वास्तविक अर्थों में हमारे लोकतंत्र को लोगों के लिए कामयाब बनाना है।
जनहित में इस कानून का उपयोग कुछ समाजसेवी या अन्य लोग कुछ समय तक लेते रहे, मगर बाद में इस अधिनियम का उपयोग लोकहित की बजाय स्वहित में होने लगा है।
आज हाल और हालात यह है कि जिसका काम नही बनता वो सरकारी अमले को सूचना का अधिकार के तहत जानकारी मांगने की धौस देकर अपना काम कराने लगा है। कथित समाजसेवी, पत्रकार, छुट भय्ये नेता आदि इस कानून की आड़ में अपना स्वार्थ हल करने की दौड़ में शामिल है।

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