एमपी-43 की जलवा: दुकान नम्बर 43 छत्तीश लाख में बिकी.. मगर काली छाया का साया भी मंडराया

रतलाम
यह पहला मौका है जब शहर के व्यापारियों ने नगर निगम स्वामित्व की किसी संपत्ति पर भरोसा जताते हुई, टेडंर प्रक्रिया में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और एमपी -43 फूड प्लाजा की निविदा प्रक्रिया में तय दाम से ज्यादा का भाव लगाकर दुकानों की खरीदी की है।
पिछले दिनों निविदा की प्रक्रिया समाप्त होने के बाद टेंडर खोले जाने की प्रक्रिया विगत दिनों से जारी है और जल्द ही ज्यादा दाम देकर दुकाने लेने वालों के नाम बाहर आ जाएगे।
इधर निविदा पोर्टल से मिली जानकारी के अनुसार पता चला है कि एमवी-43 की कई दुकानों पर खरीदारों ने बढ़ चढ़ कर दाम लगाए है। इसी के चलते दुकान नम्बर 43 पर एक खरीदार ने 36 लाख 51 हजार 111 रुपए की बोली लगाई है। इसी तरह अन्य दुकानों के भावों में भी व्यापारियों और निवेशकों ने ज्यादा दाम लगाए है।
इधर निविदा शर्तो का पालन नही कर पाने के कारण लगभग आधा दर्जन निविशकों को प्रक्रिया से बाहर भी किए जाने की खबर पोर्टल के माध्यम से बाहर आ रही है। बताया जाता है कि इन व्यापारियों ने निविदा शर्तो के अनुसार दस्तावेजों का समावेश आँन लाईन टेंडर प्रक्रिया के तहत नही किया था। इसी कारण दुकान नम्बर-1 में मात्र एक ही व्यापारी ने निविदा भरी थी, जिसे दस्तावेजों की कमी के कारण निरस्त किया जा रहा है।
पोर्टल पर प्रदर्शित हो रही प्रक्रिया और प्रचलित कार्रवाई के चलते यह भी जाहिर होने लगा है कि एमपी-43 की दुकानों की इस भारी भरकम बिक्री के बाद नगर निगम के जिम्मेदारों को अपचन होने लगा है और इस प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार समिति अपनी अपरिपक्व ज्ञान का विस्तार कर एमपी-43 की दुकानों की बिक्री को झमेले में डालने की पूरा प्रबंध करने में जुटी है। टेंडर खोलने वाले समिति के कुछ जरुरत से ज्यादा ज्ञानवान सदस्य रतलामी फ्लेवर से अंजान है। क्यूकि रतलामी खरीदार पांच रुपए का कोथमिर (धनिया) लेने भी ज्यादा है और बेचने वाला ज्यादा भाव खाता है तो खरीदार धनिये की अमानत राशि बेचने वाले के मुंह पर मार कर अपने हाथ पीछे खीच लेता है।
ऐसे में समिति के कुछ सदस्यों का जरुरत से ज्यादा ज्ञान उन सत्रह तरह की नावणों जैसा हो रहा है, जो अपनी अपरिपक्व तकनीकि से जापा (डिलीवरी) बिगाडऩे में सहायक होता है। इनका ज्यादा ज्ञान आने वाले समय में एमपी -43 की निविदा प्रक्रिया और इसके परीणामों को आने वाले समय में न्यायालय में भी चुनौती दे, इसमें कोई संशय नही है।
बहरहाल, नगर निगम स्वामित्व का फूड प्लाजा एमपी-43 इस मर्तबा शहर के भूमाफियाओं की मोनोपाँली और काली नजर से बचा तो नगर निगम की प्रशासकीय समिति के कुछ सदस्यों की कालीछाया का शिकार होता जा रहा है। अगर इन काली छाया वालों का समय रहते इलाज नही किया गया तो…. क्या होगा….यही सभी जानते है।
