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आयुष सुरक्षा पोर्टल पर भ्रामक विज्ञापन और हानिकारक दवाओं की 10 हजार शिकायते मिली

रतलाम। आयुष मंत्रालय ने गत वर्ष मई 2025 को भ्रामक विज्ञापनों, आपत्तिजनक विज्ञापनों और प्रतिकूल दवा प्रतिक्रियाओं की रिपोर्ट पर निगरानी के लिए सूचना प्रौद्योगिकी-युक्त ऑनलाइन पोर्टल आयुष सुरक्षा आरंभ किया है। इस पोर्टल पर अब तक 10 हजार से ज्यादा शिकायते दर्ज की गई है। इन शिकायतों में महाराष्ट्र पहले नम्बर पर तो मध्यप्रदेश का नाम दूसरे नम्बर पर दर्ज होना बताया गया है।
आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रताप राव जाधव ने 20 मार्च 2026 को लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि यह पोर्टल सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद, पारंपरिक दवाओं (आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी, होम्योपैथी) में भ्रामक विज्ञापनों और असुरक्षित दवाओं की निगरानी के लिए बनाया गया है। यह नागरिकों को गलत दावों वाली दवाओं की रिपोर्ट करने और उन्हें ट्रैक करने की सुविधा प्रदान करता है।
आयुष मंत्रालय के अनुसार आँन लाईन पोर्टल पर आमजन ने भ्रामक विज्ञापनों से जुड़ी 55 शिकायते दर्ज कराई है। इसी तरह राष्ट्रीय फार्माकोविजिलेंस समन्वय केंद्र, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, नई दिल्ली ने 46, आईपीवीसी, आयुर्वेद शिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, जामनगर ने भ्रामक प्रचार की 945 और प्रतिकूलता दवाओं से जुड़ी 63 शिकायते दर्ज कराई है। आईपीवीसी, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर ने भ्रामक प्रचार की 5267 और 65 प्रतिकूल दवाओं की शिकायते, आईपीवीसी, राष्ट्रीय होम्योपैथी संस्थान, कोलकाता ने भ्रामक प्रचार की 288 शिकायते, आईपीवीसी, राष्ट्रीय यूनानी चिकित्सा संस्थान, बेंगलुरु ने भ्रामक प्रचार की 2391 और प्रतिकूल दवाओं की 54 और आईपीवीसी, राष्ट्रीय सिद्धा संस्थान, चेन्नई ने 1277 भ्रामक प्रचार और प्रतिकूल दवाओं की 34 शिकायते दर्ज कराई है। इस तरह अब तक भ्रामक प्रचार की कुल 10269 और प्रतिकूल दवाओं की 216 शिकायते दर्ज की गई है।
प्रदेश सरकारों से प्राप्त जानकारी पर नजर डाले तो आयुष सुरक्षा पोर्टल पर अब तक महाराष्ट्र राज्य से मिली 1112 शिकायतों का निराकरण किया जा रहा है। मध्यप्रदेश राज्य से कुल 975 शिकायते मिली थी, जिसमें से अब तक मात्र 197 शिकायतों का निराकरण हो पाया है। इसी तरह उत्तराखंड, त्रिपुरा, हिमाचल आदि प्रदेशों से मिली शिकायतों का निराकरण भी संबधित विभाग कर रहा है।
आयुष सुरक्षा पोर्टल के माध्यम से नागरिकों और पेशेवरों दोनों को आयुष प्रणालियों की अखंडता की रक्षा में सक्रिय भागीदार बनने के लिए सशक्त बनाने का कार्य किया जा रहा है। यह भ्रामक विज्ञापनों के विरुद्ध एक सतर्क निगरानी तंत्र के रूप में कार्य कर ये सुनिश्चित करता कि लोगों तक केवल सुरक्षित और विश्वसनीय उत्पाद ही पहुंचें।
दवा से लेकर पेस्ट और घी तक
आयुर्वेदिक दवाओं का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन बिना वैध लाइसेंस के इनकी बिक्री अब गंभीर अपराध मानी जा रही है। ये दवाएं अब पाउडर, टैबलेट, फर्मेंटेड फार्मूलेशन, मेडिकेटेड घी, आयल, मिनरल-मेटल आधारित, पेस्ट तथा प्रोप्राइटरी-पेटेंट और क्लासिकल रूपों में उपलब्ध हैं।
सजा और जुर्माने का है प्रावधान
शास्त्रोक्त और पेटेंट दोनों तरह की औषधियां बाजार में हैं, लेकिन इनकी बिक्री के लिए औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940 (ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट) और इसके नियम 1945 के तहत लाइसेंस अनिवार्य है। बिना लाइसेंस के आयुर्वेदिक दवाएं बनाना, बेचना, स्टाक करना या वितरित करने पर सजा का प्रावधान है।
पहली बार अपराध पर एक वर्ष तक की कैद और न्यूनतम दो हजार रुपये का जुर्माना। यदि दवा मिलावटी या नकली पाई गई तो सजा तीन वर्ष तक बढ़ सकती है। साथ ही भारी अर्थदंड लगता है। रजिस्टर्ड आयुर्वेदिक चिकित्सक (बीएएमएस आदि) अपने मरीजों को व्यक्तिगत रूप से दवा तैयार कर दे सकते हैं, लेकिन वितरकों या अन्य मरीजों को बेचने के लिए मैन्युफैक्चरिंग या सेलिंग लाइसेंस जरूरी है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से समस्या
आयुष मंत्रालय ने 8 साल में 65 हज़ार भ्रामक विज्ञापन पकड़े, 3000 दवाओं के साइड इफेक्ट दर्ज किए है। आयुष सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने यह जानकारी दी. यह कार्रवाई ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954 के तहत की गई है। उन्होने बताया कि प्रिंट मीडिया में भ्रामक विज्ञापनों को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया गया है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह बड़ी समस्या बन जाती है। ऐसे मामलों की जानकारी मंत्रालय के क्षेत्रीय केंद्रों के जरिए मिलती है, जिन्हें ऐसे विज्ञापनों की पहचान कर रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी दी गई है.

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