लापता इंसान की अब गुमशुदगी नही सीधे एफआईआर दर्ज होगी

रतलाम माननीय सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय से मध्यप्रदेश सहित देश के कई राज्यों की पुलिस की सांसे ऊपर नीचे हो रही है। राज्य सरकारें माननीय न्यायालय के इस निर्णय पर विचार मंथन कर रही है कि इस आदेश का पालन अपने राज्य में किया जाए या नही किया जाए। न्यायालय ने ऐतिहासिक और देशव्यापी आदेश दिया है कि अब किसी भी इंसान बालिक या नाबालिंग अगर गुम होता है, तो उसकी गुमशुदगी की बजाय सीधे एफआईआर दर्ज की जाए।
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार माननीय सर्वोच्च न्यायालय (जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ) ने 22 मई 2026 को आदेश जारी किया है कि चाहे बच्चा हो या कोई बालिग व्यक्ति (महिला या पुरुष), जैसे ही किसी व्यक्ति के लापता होने की सूचना मिलती है, पुलिस को बिना किसी प्रारंभिक जांच के तुरंत एफआईआर दर्ज करनी होगी।
इधर इस आदेश के बाद पुलिस का काम बढऩा तय है कि क्यूकि अब तक गुम हुए इंसान की गुमशुदगी दर्ज होती आ रही है, और अगर लापता इंसान कुछ समय के बाद लौट आता है तो पुलिस उस मामले को थाना स्तर पर ही लिखा पढ़ी करके खात्मा कर देती है।
मगर अब गुमशुदगी की बजाय एफआईआर होगी तो ऐसे प्रकरणों का खात्मा न्यायालय स्तर हो सकेगा। ऐसे में जहां एक और पुलिस पर काम का बोझ बढ़ेगा वही आपराधिक आंकड़ों में भी इजाफा होगा ।
अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि गुमशुदगी की सूचना मिलते ही पुलिस तुरंत इसे भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस 2023) के तहत अपहरण या मानव तस्करी से जुड़ी सुसंगत धाराओं में दर्ज करे, ताकि मामले की गंभीरता से जांच शुरू हो सके।
ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (नजीर फैसला)
सर्वोच्च न्यायालय के इस संविधान पीठ के फैसले के अनुसार, यदि शिकायत से किसी संज्ञेय अपराध का होना प्रकट होता है, तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 173 के तहत एफआईआर दर्ज करना पुलिस के लिए अनिवार्य है। बालिग व्यक्ति के अचानक गायब होने में यदि किसी भी प्रकार की अनहोनी, जबरन ले जाने या साजिश की आशंका है, तो पुलिस 24 या 48 घंटे इंतजार करने का बहाना नहीं बना सकती।
फरियादी को पुलिस टालती है तो ….
अगर स्थानीय पुलिस थाना बालिग व्यक्ति के लापता होने पर एफआईआर दर्ज नहीं कर रहा है और केवल गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखकर छोड़ रहा है, तो फरियादी को कानूनी अधिकार होगा कि वह जिले के पुलिस अधीक्षक (एसपी) या पुलिस कमिश्नर को लिखित में शिकायत भेज सकते हैं या व्यक्तिगत रूप से मिल सकते हैं। अगर यहां भी न्याय नही मिलता है तो वह न्यायालय की शरण लेकर सीधे अपने क्षेत्र के मजिस्ट्रेट (कोर्ट) के समक्ष आवेदन कर सकते हैं। मजिस्ट्रेट के पास पुलिस को तुरंत एफआईआर दर्ज कर जांच करने का आदेश देने का पूरा अधिकार है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका यदि किसी बालिग व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी व्यक्ति या अवैध हिरासत में रखे जाने की गंभीर आशंका है, तो आप भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय या अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर कर सकते हैं। इसके बाद कोर्ट पुलिस को उस व्यक्ति को सशरीर ढूंढकर अदालत के सामने पेश करने का कड़ा आदेश देती है।
नागरिकों के लिए अपील है कि वह पुलिस को शिकायत देते समय गुमशुदा व्यक्ति का पूरा विवरण (जैसे- आखिरी बार कब और किसके साथ देखा गया, मोबाइल लोकेशन, कॉल डिटेल्स, सीसीटीवी फुटेज की जानकारी, और कोई आपसी रंजिश या धमकी) लिखित में दें, ताकि मामले में तत्काल एफआईआर दर्ज करने का ठोस आधार बने।
बताया जा रहा है कि तमाम राज्यों की पुलिस हाल ही में मिले इस आदेश को पालन करने से पहले मंथन कर रही है, अब इस आदेश का पालन कब तक हो पाएगा? ये आने वाला समय बताएगा।
