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कोर्ट की टिप्पणी:आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की बर्खास्ती, हथौड़े से मख्खी मारने जैसा काम

रतलाम। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता एक दिन तबियत खराब होने के कारण आंगनवाड़ी केन्द्र पर उपस्थित नही हो पाई और उसी दिन प्रोजेक्ट ऑफिसर वहां निरीक्षण के लिए पहुच गए और कार्यकर्ता की गैर हाजिरी पर उन्हे बर्खास्त करने के निर्देश दे गए। कलेक्टर ने भी ताबड़तोड़ विभाग को बोल कर इस कार्यकर्ता को नौकरी से हटवा दिया। मामला जब हाईकोर्ट में पहुचा, कोर्ट ने इस बर्खास्ती पर आश्चर्य करते हुए जिम्मेदारों को फटकार लगाते हुए कहां कि एक मख्खी को मारने के लिए लोहे के हथोड़े का इस्तमाल किया गया है। कोर्ट ने बर्खास्ती समाप्त करने के निर्देश दिए है।
मामला खंडवा जिले के चमाटी गांव के आंगनबाड़ी केंद्र क्रमांक एक की कार्यकर्ता ममता तिरोले का है जिसे वर्ष 2020 में सेवा से बर्खास्तगी का आदेश दे दिया गया था। इस पर तिरोले ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लगभग तीन साल तक लगातार न्याय के लिए प्रयास करते रहने के बाद अब जबलपुर हाईकोर्ट ने उनके हक में फैसला दिया है।
कोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा एक ही आचरण पर जब एक बार सजा मुकर्रर कर दी गई, तो उसी के लिए सेवा से बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई अनुचित है। प्रोजेक्ट ऑफिसर ने अपने स्वविवेक का इस्तेमाल नहीं किया है।
जबलपुर हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुजय पॉल की एकलपीठ ने 60 दिन के भीतर याचिकाकर्ता को बहाल करने और सभी अनुषांगिक लाभ देने के निर्देश दिए। कोर्ट ने यह भी माना कि जब उक्त कृत्य के लिए पहले 8 दिन के वेतन कटौती का आदेश दे दिया गया था, तो बाद में कलेक्टर के निर्देश पर सेवामुक्त करना पूरी तरह से अवैधानिक है।
मामला खंडवा जिले के चमाटी गांव के आंगनबाड़ी केंद्र क्रमांक एक की कार्यकर्ता ममता तिरोले का है जिसे वर्ष 2020 में सेवा से बर्खास्तगी का आदेश दे दिया गया था। इस पर तिरोले ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लगभग तीन साल तक लगातार न्याय के लिए प्रयास करते रहने के बाद अब जबलपुर हाईकोर्ट ने उनके हक में फैसला दिया है।
कोर्ट ने हैरानी जताते हुए कहा एक ही आचरण पर जब एक बार सजा मुकर्रर कर दी गई, तो उसी के लिए सेवा से बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई अनुचित है। प्रोजेक्ट ऑफिसर ने अपने स्वविवेक का इस्तेमाल नहीं किया है।
जबलपुर हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुजय पॉल की एकलपीठ ने 60 दिन के भीतर याचिकाकर्ता को बहाल करने और सभी अनुषांगिक लाभ देने के निर्देश दिए। कोर्ट ने यह भी माना कि जब उक्त कृत्य के लिए पहले 8 दिन के वेतन कटौती का आदेश दे दिया गया था, तो बाद में कलेक्टर के निर्देश पर सेवामुक्त करना पूरी तरह से अवैधानिक है।

