अब पता चलेगा,,कौन पारस ? और कौन ..पत्थर है ?

रतलाम। मुख्य राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों को चयन हो चुका है। रतलाम शहर के चर्चित और सेवाभावी एक उम्मीदवार का टिकिट फाईनल होने के बाद जश्न अभी भी जारी है और अन्य पार्टी से हाल मेें तय किए गए उम्मीदवार क्षण भर के जश्न को विराम देकर काम पर लग गए है। इस मर्तबा उम्मीदवार को छोड़ पार्टियों की साख दाव पर लगी हुई है इसलिए पार्टी के चुनाव चिन्ह को महत्व दिया जा रहा है। किसने क्या और कौन क्या करेगा ? इससे ज्यादा महत्वपूर्ण पार्टी को जीत का वरण करना ही दोनो तरफ खास माना जा रहा है। इस समय हर उम्मीदवार के लिए उसके दल का नेता या कार्यकर्ता पारस के समान है, जो जनता के सम्पर्क में आकर उम्मीदवार को सोने के रुप में वोट दिलवाएगा। अब दल के नेता और कार्यकर्ता अपने उम्मीदवार के लिए पारस साबित होते है या पत्थर ये चुनाव परीणाम आने के बाद ही पता चलेगा।
एक दल अपनी जीत को लेकर आश्वस्त है क्यूकि पार्टी लम्बे समय तक सत्ता में रही है और इस पार्टी के उम्मीदवार को पता है कि जनता पिछली मर्तबा की तरह इन्हे इस बार भी सिर आँखों पर बैठा लेगी। उधर दूसरे दल के नेता कार्यकर्ता लगभग 18 सालों से वनवास भोग रहे है, कुछ समय सत्ता मिली मगर आपसी सिर फुटव्ल के कारण नर्मदे हर कर के सभी घर बैठ चुके है।
उधर दोनो ही दल के नेता अपने नेता कार्यकर्ताओं को बार-बार सीख दे रहे है कि चुनाव में उम्मीदवार को देखने की बजाय पार्टी का चुनाव चिन्ह देख कर चुनाव लडऩा है, तभी हम इस चुनावी संग्राम को फतेह कर पाएगे।
इधर एक दल के प्रत्याशी तो 15 दिन से पहले से ही काम पर लग गए है और दूसरे दल के नेता आज सुबह से चुनाव जीतने की रणनीति में जुट चुके है। पहले महापौर और विधायक रहे प्रत्याशी को पारस समझ कर दाँव लगाया है, मगर इस पारस को अभी अपने ही घर के कितने पत्थरों से टकराना है ? ये आने वाला समय ही बताएगा। टिकिट और अपने फायदे के लिए पार्टी को अपनी माँ कहने वाले उम्मीदवार का सहयोग कर के बेटा या बेटी होने का कितना फर्ज निभाएगे ? ये भी अभी से नजर आने लगा है।
वफा-वादे सब बाते है और बातों का क्या. ? ठीक इसी तरह उम्मीदवार कोई भी हो,हम तो पार्टी के लिए काम करेगे. .जैसी कसमे खाने वाले पत्थर क्या ? पारस के सम्पर्क में आकर सोने बनने का प्रयास करेगे ? या अपने ही दल के उम्मीदवार को पत्थरों तले कुचल देगे, ये भी आने वाला समय बताएगा। क्यूकि पार्टी के बड़े नेता तो अपने हर कार्यकर्ता को पारस समझते है उनका मानना है कि हमारा हर कार्यकर्ता पारस है और इसके छूने मात्र से पत्थर भी स्र्वण सा रुप ले लेता है। ऐसे में सभी की निगाहे पारस के लिए काम करने वाले अपने हर पारस कार्यकर्ता पर टिकी हुई है।
बहरहाल .. ये चुनाव है और ऊँट और नेता कार्यकर्ता कब किस करवट या किसकी गोद में बैठ जाए ? ये कहां नही जा सकता है। राजनीति कुछ को वफादारी तो कईयों को गद्दारी सिखाती है। शायर हफीज बनारसी अपनी गजल के एक शेर में कहते है कि दुश्मनों की जफा का खौफ नही, दोस्तों की वफा से डरते है।
