उज्जैन कांड: इन्सानियत तो जिंदा है, कानूनी कार्रवाई के कारण मर्दानगी मर गई
पुलिस पूछताछ और बैवजह की कार्रवाई से आज भी कतराते है लोग

रतलाम। बात करीब 20-22 बरस पुरानी है जब मै नवभारत अखबार में संवाददाता हुआ करता था। रात्रि में करीब 11 बजे दफ्तर से लौटते समय घर के समीप ही स्थित स्टेशन रोड़ पर किसी तरह की खबर के चक्कर में पहुच गया। रोजनामचे में कोई खास खबर नही होने के बाद साईकल उठा कर घर की तरफ लौट रहा था कि तभी एक आँटो रिक्शा वाले भाई जान किसी महिला को लेकर सीधे उस समय के थानेदार मिले और बोले कि सर, यह महिला किसी ट्रेन से उतर कर दिलबहार चौराहे पर भटक रही थी, इसकी बोली मुझे समझ नही आ रही है और चेहरे से लगता है कि परेशान है। कद काठी से लम्बी-पूरी और 35-40 साल की इस महिला को देख थानेदार पहले तो लाल पीले हुए और फिर आँटो चालक को बोले कि मूर्ख यह महिला भटक रही थी तो भटकने देता, हमारी रात को क्यी काली करने के लिए इसे यहां ले आया। कुछ देर इसे इधर उधर घुमाता और फिर वही स्टेशन पर छोड़ आता।
खैर महिला मद्रास राज्य की थी, मन मसोस कर पुलिसकर्मियों ने महिला की भाषा के जानकार से उसका पता ठिकाना पूछा और तीसरे दिन महिला को उसके ठिकाने पर छोड़ा गया।
दरअसल, अज्ञात या राह भटके लोगों को आज भी कानून के रखवाले कीड़े-मकोड़ों की तरह समझते है और इनकी सेवा को समय की बर्बादी मानते है।
उज्जैन में मासूम के साथ की गई शर्मनाक हरकत के बाद वह आठ-दस कि.मी तक भटकती रही, मगर उसे मदद करने वाला कोई कानून का रखवाला नही मिला। जबकि महाकाल लोक बनने के बाद उज्जैन प्रदेश व देश का चर्चित विषय बन चुका है।
यहां लोगों ने अपने घरों को होटल, धर्मशाला और गेस्ट हाउस का रंग रुप दे दिया है तो आटो रिक्शा और ई रिक्शा वालों की मानों तो बाढ़ सी आ गई है। उज्जैन में भीड़ हर दिन बढ़ रही है, मगर कानून व्यवस्था संभालने वाले वही उज्जैन की आबादी के मान से तैनात है।
बच्ची के साथ हुई हरकत के बाद हर तरफ से ये सवाल उठ रहा है कि उज्जैन वालों के दिल में रहम नही है, यहां के लोगों की इंसानियत मर चुकी है। ऐसा लिखने, कहने और बोलने वालों से कोई ये पूछे कि अगर तुम इस जगह होते तो क्या करते ?
पुलिस की पूछताछ से आज भी हर कोई घबराता है। बच्ची सडक़ पर बदहवास घुम रही थी, मगर किसी ने उसे तन पर ढकनें को कपड़ा नही दिया। क्यूकि कपड़े देने वाले के मन में भय था कि पुलिस को पता चलेगा तो वह पहले कपड़ा देने वाले को ही धर कर पूछेगे कि बच्ची के पुराने कपड़े कहां है, पहले पुलिस को सूचना क्यो नही दी ? तुमने कपड़े बदलवाकर सबूतों से छेड़छाड़ की है। आदि-आदि इसी तरह के सवालों से भला करने वाले के दो तीन दिन खराब हो जाते है। ऐसे में आमजन में भलाई की भावना होते हुए भी वह किसी मुसीबतजंदा की मदद करने के मामले में कन्नी काट लेता है। क्यूकि कानून के रखवालों को तो प्रकरण की फाईल दाखिल दफ्तर करने की जल्दी रहती है और वो असल मुजरिम तक काफी देर तक पहुच पाती है।
ऐसे प्रकरण आए दिन हमारे सामने आते है जिसमें कहां जाता है कि लोग वीडिय़ों बनाते रहे, तमाशबीन बने रहे, देखते रहे, मूकदर्शक आदि आदि बने रहे है और इस सबके पीछे कानूनी हिसाब किताब और पूछताछ आदि में होने वाले घबराहट रहती है।
बहरहाल, लोगों में इंसानियत आज भी जिन्दा है और तो आज भी किसी बहन-बेटी की इज्जत पर हाथ डालने वालों या किसी निर्दोष के जुर्म करने वालों को मौके पर ही सबक सिखाने की हिम्मत रखते है, मगर कानून की पेचेंदगियों ने उन्हे नामर्द बना रखा है। अच्छा हो कि इस तरह के अपराध की रोकथाम के लिए आमजन को विश्वास में लिया जाकर उन्हे कानूनी कार्रवाईयों से राहत दी जाए, तभी पुलिस और जनता के समन्वय से अपराधों की रोकथाम होगी, वरना.. जो चल रहा है, वह चलता रहेगा और अपराध होने के बाद सभी लाठी पीटते रहेगे।§
