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मिलावट: दिखावे की जमावट और निर्देश पालन की सजावट!

बदल रहा है देश और बदलती जा रही है,सियासत, मगर नही बदली जनता के हिस्से के दानों में होने वाली मिलावट ।।
रतलाम। सब को पता है कि शहर सहित जिलेभर में मिलावटखौर वर्षो से सक्रिय है। रतलाम हो या जावरा और आसपास के इलाकों में खाद्य पदार्थो में मिलावट के कई मामले वर्षो पूर्व प्रकाश में भी आए और दवाई से लेकर घी आदि में मिलावट के प्रकरण बने। वो दौर और था, आज का समय अलग है। अब सिर्फ खाद्य सुरक्षा करने वाले सिर्फ तीज त्यौहारों पर निकल कर सालभर की कार्रवाई दो चार माह में ही दिखा देते है। पिछले दिनों प्रशासन के आला अधिकारियों ने जिम्मेदार विभाग के अधिकारियों को ठासा तो दो चार दिन से प्रेसनोट के माध्यम से विभागीय कार्रवाई का महिला मंडन जाहिर होने लगा है।
रतलाम शहर की ही बात करे तो यहां मिलावट की शुरुवात स्टेशन से लेकर शहर के अंतिम चारों छोर तक जारी है। शहर की अन्य दुकानों पर सेव और नमकीन भले ही 250 रुपए तक बिके मगर स्टेशन रोड़ क्षेत्र में 100 रुपए किलों की सेव बिकना जारी है। करीब 150 से 200 तक का घाटा खा कर सेव का व्यापार करने वाले इन दानियों के कारखानों पर कभी इनके नमकीन की गुणवत्ता नही परखा जाना कई सवालों को जन्म देता है।
किराना दुकानों पर धनिये लेकर अन्य मसाले, घी, तेल आदि खाद्य पदार्थो की जांच समय-समय पर होना चाहिए। मगर शहर में जब तक मोरधन कांड का शिकार होकर जब तक 50-60 लोग सरकारी अस्पताल में भर्ती नही हो जाते है, तब तक कोई किराना दुकानों में झांकने वाला नही है।
शहर के हर कोने में स्थायी-अस्थायी चौपाटियों की बसाहट हर जगह हो चुकी है। दो बत्ती स्थित चौपाटी पर हर दिन एक से दो हजार लोग चाट का स्वाद देने आते है। यहां चाट वाले कितनी गुणवत्ता वाली सामग्री, मसालों का उपयोग कर रहे है ? ये जानने का आज तक किसे ने प्रयास ही नही किया है। पनीर, तेल, घी, पताशों की क्वालिटी, पानी आदि को लेकर यहां से तमाम मर्तबा शिकायते सामने आई है, मगर हर बार कार्रवाई राम भरोसे रह जाती है।
नगर के कोने-कोने में पानी पताशे वाले बिछे पड़े है, लोग भी सुबह से लेकर देर रात तक यहां लगे पड़े रहते है, मगर इनके पास गुणवत्ता वाले पताशे या पानी है कि नही ? ये भी कोई जानने समझने वाला नही बचा है।
शहर में भले ही कुछ भोजनशाला या होटले हो, मगर हर महिनें एक भोजन की दुकान खुल जाती है। इन दुकानों में परोसे जाना वाला भोजन किस क्वालिटी का है, इस तरफ खाद्य सुरक्षा करने वालों का ध्यान कभी गया ही नही है।
दवाई-दारु वाले भी मस्त है। कफ सिरप से लेकर तमाम तरह की दवाईयों में घालमेल करने वाले भी रतलाम में कुछेक है, ये खाद्य सुरक्षा वालों को छोड़ कर सब को पता है, मगर कार्रवाई कौन करे ? महीनें की पगार लो और जब तक इच्छा हो रतलाम में टीके रहों।
शहर और आसपास के इलाकों में दूध का व्यापार करने वाले बड़े व्यापारियों के यहां लगी लाखों रुपए की मशीने दूध की जान निकालकर जनता को जो दूध दे रहे है, उसकी कहानी भी सभी को पता है, मगर वर्षो से विभाग के लिए दूध देती गाय साबित होने वाले इन व्यापारियों पर किसी ने तीरछी नजर करने की हिमाकत नही की है।
जानकारों की माने तो मिलावटी सामग्री का शिकार सबसे ज्यादा दिहाड़ी मजदूरी करने या हर दिन छुट्टा सामान लेने वाले कमजोर तबके या मध्यमवर्ग का परिवार होता है। धन्ना सेठ तो 70 रुपए लीटर वाला दूध और 700 रुपए किलों का घी तक चगर लेने की क्षमता रखते है।
बहरहाल, मिलावट का ये खेला अब चारों तरफ रैला होकर रायता फैलाता जा रहा है, और जिम्मेदार मिलावट के इस खेल में दिखावे की कार्रवाई और निर्देश पालन की जमावट कर अपने नम्बर बढ़ाने में लगे है। ऐसे में मिलावट पर कसावट अभियान को कैसे सफलता मिलेगी ? ये जिम्मेदार ही बता सकते है।

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