राजनीति

खाट की जमावट से ” बा” बेदम.. साहब की भी सांसे फूली

आदिवासी बहुल ग्रामीण सीट पर रफ्तार ले रहा है, आदिवासी नेतृत्व

रतलाम। आदिवासी बहुल इलाकों से घिरे रतलाम में इस बार के विधानसभा चुनाव खासे चर्चा में बने हुए है। यहां कि रतलाम ग्रामीण व सैलाना सीटों पर कांग्रेस और भाजपा ने भले ही दंबग प्रत्याशियों को मैदान में उतार रखा है, मगर इन्ही इलाकों के फालियों (चौराहों) पर होने वाली खाटला (खटियां) बैठकें इन दंबगों की सांसे फूला रही है। इन क्षेत्रों में अब इस वर्ग का हर समर्थक खुद
करीब दस-बाहर साल पहले आदिवासी क्षेत्रों में अपने ही बीच के किसी व्यक्ति को नेतृत्व सौपने की रणनीति बनी और इन क्षेत्रों में कुछ पढ़े लिखे और मध्यमवर्गीय परिवारों की खोजबीन कर इनका समूह बनाया गया। आदिवासियों का मानना था कि उनकी कही सुनवाई नही होती है, ये गरीब और अति पिछड़े हुए है। राजनीति से जुड़े नेता-कार्यकर्ता सिर्फ इनका उपयोग करते है और सरकारी अफसर इन्हे दुत्कार कर भगा देते है। इनका मानना था कि सबसे ज्यादा अत्याचार इनके वर्ग के साथ ही हो रहा है।
ऐसी ही विसंगतियों को समाप्त करने के लिए जयस नामक संगठन बनाया गया और जगह-जगह टांट्या मामा और बिरसा मुंडा की प्रतिमाएं स्थापित कर लोगों को जागरुक किया गया। इसी जागरुकता के चलते ग्रामीण इलाकों में रहने वाले आदिवासियों को पंच सरपंच के साथ ही जिला पंचायत और जनपद पंचायतों के चुनाव लड़वाए गए, जिसमें ये जीते भी है। आज जिला पंचायत से लेकर जनपद पंचायतों व पंच-सरपंचों की कुर्सी पर कई दर्जन आदिवासी वर्ग के नेता बैठे हुए है।
जयस के प्रभाव को देखते हुए राजनीति दलों खासकर कांग्रेस और भाजपा ने विगत पांच साल पहले समाज में प्रभाव रखने वाले आदिवासी नेताओं को अपनी पार्टी के बैनर तले चुनावों में टिकिट देने का वादा किया और इस वादे के मुताबिक आदिवासी नेताओं ने समाज के बीच खुद का बेहतर रुतबा भी जमा लिया था, मगर इस चुनाव में इनकी बजाय किसी अन्य को टिकिट दिए जाने से आदिवासी क्षेत्रों में भौकाल मचा हुआ है, और वादा पुरा नही होने पर टिकिट के दांवेदार अब निर्दलीय चुनाव मैदान में उतर कर पार्टी प्रत्याशियों के सामने खम ठोक रहे है।
रतलाम ग्रामीण में कांग्रेस ने जनपद पंचायत के सीईओं रहे लक्ष्मण डिंडोर को मैदान में उतारा है, ये मूल रुप से थांदला-पेटलावद क्षेत्र के रहवासी बताए जाते है और इन्हे टिकिट दिए जाने के बाद बाहरी प्रत्याशी होने पर कांग्रेस के नेता-कार्यकर्ताओं ने ही विरोध जताया था, इसी के चलते पूर्व जिला कांग्रेस की अध्यक्ष रही श्रीमती कोमल धुर्वे ने पिछले दिनों पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा भी दिया है। इस विधानसभा में विगत वर्षो से सक्रिय रहे जयस नेता डाँ.अभय ओहरी ने निर्दलीय पर्चा दाखिल किया है। डाँ. ओहरी और इनकी पत्नी चिकित्सीय पेशे से जुड़े हुए है। लेकिन औधोगिक निवेश क्षेत्र को लेकर गत हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान आदिवासी क्षेत्र के ग्रामीणों ने डाँ.ओहरी के नेतृत्व में ही मोर्चा खोला था, ऐसे में आदिवासी बहुल इलाकों के लोगों ने इन्हे विधानसभा चुनाव में भी खड़ा करवा दिया। उधर जावरा विधानसभा में खड़े हुए करणी सेना के जीवनसिंह ठाकुर शेरपुर का इन्हे रतलाम ग्रामीण में समर्थन मिल जाने से चुनावी सरगर्मी यहां तेज होने लगी है।
उधर सैलाना विधानसभा में विधायक रहे हर्षविजय गेहलोत को कांग्रेस ने मैदान में उतारा है तो भाजपा ने संगीता चारेल पर एक बार फिर दांव लगाया है। किन्तु इस आदिवासी बहुल विधानसभा में भारतीय आदिवासी पार्टी से नेता कमलेश्वर डोडियार, मैदान में खेल बिगाड़ रहे है। इसी सीट पर समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी भारतीय ट्राईबल पार्टी ने भी अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे हुए है।
दो लाख से ज्यादा आदिवासी मतदाता
रतलाम ग्रामीण विधानसभा में 2 लाख 13 हजार वोटर है, जिसमेंसे 75 हजार आदिवासी, 25 से 30 हजार एससी (भीम आर्मी)वर्ग व शेष मतदाताओं में जाट, धाकड़, पाटीदार आदि वर्ग के लोग रहते है। इसी तरह सैलाना विधानसभा क्षेत्र में कुछ मतदाताओं में से लगभग 80 प्रतिशत आदिवासी मतदाता बताए जाते है।
क्या है खाटला बैठक
आदिवासी बहुल इलाकों में माना जाता है कि परिवारों के घर दूर दराज के इलाकों में रहते है ऐसे मेें चुनाव में खड़े हुए प्रत्याशी डोर टू डोर जनसम्पर्क नही कर पाते है। ऐसे में सुबह या शाम के समय पर आदिवासी परिवार किसी एक चौराहे, चौपाल या फलिया पर एकत्र हो जाते है। यहां चर्चा होती है और चर्चा के बाद निर्णय के रुप में किसके पक्ष में मतदान किया जाना है, इसकी शपथ ली जाती है। ऐसे ही निर्णय किसी अपराध, पारिवारिक विवाद आदि के दौरान भी भांजगड़े के रुप में होते है।
प्रत्याशी का होता है, पूरा सम्मान
शहरी व अन्य क्षेत्रों में चुनावें के दौरान उम्मीदवार के जन सम्पर्क के दौरान समर्थक मतदाताओं को फूलमाला व सत्कार के साधन जनता को उपलब्ध करा देते है। उम्मीदवार मतदाताओं का अभिवादन हाथ जोडक़र या पैर पकडक़र करता है। मगर आदिवासी बहुल इलाकों के मतदाता अपने वर्ग के प्रत्याशी का स्वागत सत्कार अपने ही साधनों से करते है। यहां चुनाव में खड़े हुए उम्मीदवार का फूल माला से स्वागत करने से पहले अपने पैरों से जूते व चप्पल निकाल देता है। उम्मीदवार को साफा बांधा जाता है।

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