अश्विनी भिया…मोबाईल से आपका नम्बर कभी डिलीट नही हो पाएगा

रतलाम। रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई। अश्विनी भिया (शर्माजी) से मेरी मुलाकात उस समय हुई थी, जब में वरिष्ठ खेल प्रशिक्षक अमानत खान सर की पाठशाला में दौडऩे का प्रशिक्षण लेकर कई जिलों तक खेल चुका था। अश्विनी भिया मुझे दौड़ते देख कर बोले थे कि दौड़ेगा तो जिन्दगी भर दौड़ता रहेगा कभी.. क्रिकेट-फ्रिकेट में हाथ आजमाया कर ?
मैने कहां भिया… सोच कर बताउगा….। उसी समय उन्होने कहां था कि दौडऩा अच्छी बात है, मगर कभी-कभी गेम (खेल) बदल भी लेना चाहिए। अगर रास्ता नही बदला तो जिन्दगी जीवन भर दौड़ाती है। मैने उन्हे हामी भरी थी, कुछ दिन क्रिकेट भी खेला, मगर दौड़ का मोह नही छूट पाया तो उन्होने कहां कि जब तेरी इच्छा हो.. प्रेक्टिस करने आ जाया करना।
दरअसल, नेहरु स्टेडियम और हमारा पचास साल पुराना नाता है। आज के भाजपा जिलाध्यक्ष प्रदीपजी, नगर निगम आयुक्त कार्यालय प्रमुख सुभाष गोयलजी सहित 18 ऐसे परिवार थे, जिनका बचपन और युवावस्था नेहरु स्टेडियम स्थिति निगम स्वामित्व के मकानों में ही बीता है। और यही से हम सभी अश्विनी भिया का शौर और दहाड़ सुनते आए थे।
बचपन बीता… और बुढ़ापा आने लगा है। हर दिन नटराज स्पोट्र्स न्यूरोड़ के बाहर अश्विनी भिया से मुलाकात होती, कुछ घंटों तक खेल, खिलाड़ी, समाजसेवा, वर्तमान राजनीति, घर-परिवार सहित तमाम बाते होती रही। कभी कभार बातचीत में बोल देते… अनिल भिया… तुमको कहा था कि खेल में ही दम भर दो… आज कही रेलवे-वेलवे में नौकरी करते रहते? मै कहता कि भिया… जो बीत गया है, वो लौट कर नही आएगा।
इसी बीच बीते 14 नवम्बर 2025 को राष्ट्रीय व्यापी खेलो इंडिया के तहत कालेज ग्राउण्ड पर अस्मिता खेल प्रतियोगिता का आयोजन अन्तराष्ट्रीय खेल प्रशिक्षित अमानत खान के नेतृत्व में हुआ तो वहां मै अपनी आठ वर्षीय बेटी के साथ उसे स्पर्धा दिखाने ले गया। वहां भी अश्विनी भिया मुस्कुराते हुए बोल पड़े कि अनिल भिया… कम से कम इस गुडिय़ा को तो बेहतर खिलाड़ी बना देना। मै बोला कि आप जानों और आप का काम जाने। इस पर अश्विनी भिया बोले इसे आठवी उतीर्ण कराने के बाद खेल मैदान में उतारेगे।
मगर क्या पता था कि…. भगवान को क्या मंजूर था। लोग कहते है कि लोग खाली हाथ और खाली हाथ चले गए, क्या साथ लेकर गए? आज जब भय्या की अंतिम यात्रा में असंख्य लोग उन्हे अंतिम बिदाई देने पहुचे तो यह भ्रम भी दूर हो गया कि भले ही इंसान खाली हाथ दुनिया को विदा करता है, मगर उसके कर्म उसे बरसों बरस तक हर चाहने वाले के दिल में जिंदा रखते है। मै भी इसी पर मन ही मन विचार कर रहा था कि तभी जवाहर नगर मुक्तिधाम में शवयात्रा के प्रवेश के दौरान वरिष्ठ शिक्षाविद्, रंगकमी, साहित्यकार और माणकचौक स्कूल में मेरे गुरु रहे श्री ओमप्रकाश मिश्रजी जी का मैने अभिवादन किया तो वो बोल पड़े कि… देख बेटा… लोग कहते है कि क्या छोड़ कर गया है ? इस हुजूम को देखों.. अश्विनी.. अपनी यादे, बाते, व्यवहार, समाजसेवा, रक्त लेने वाले अनेकों माता,बहनों,बच्चों की दुआएं, अनेकों खिलाडिय़ों की दुआए आदि लेकर गया है।
मेरे जैसे कई हजार लोग होगे.. जिनके मोबाईल में अश्विनी भिया का नम्बर दर्ज होगा। मुझसे तो हर दिन व्हाटशाप पर राम-राम, श्याम-श्याम हुआ करती थी, कभी कभी ज्ञान की बाते भी पोस्ट कर दिया करते तो कभी-कभी मुलाकात के दौरान किसी गलत बात या हरकत पर जमकर खिचाई भी करते हुए कहते थे कि अनिल भिया.. तुम जैसे लोग सिर्फ दौडऩे के लायक ही हो… दौड़ते रहो। अब हर दिन खेल जगत, समाजसेवा, कर्मचारी हितैषी, सरकारों की नीति-अनीति पर चर्चाए और ऐसे अनगिनत ज्ञान की बाते करने वाला चला गया। हर दिन मोबाईल पर एक मैसेज आता था, कुछ दिनों से नही आ रहा है, मुझे बता अब आ भी नही पाएगा। मगर जब तक जिन्दा रहूगा… तब कर अश्विनी भाई का मोबाईल नम्बर डिलीट भी नही हो पाएगा।
अश्विनी… भिया जहां भी रहो… हम जैसों को आर्शिवाद प्रदान करते रहना…. आपने कहां था कि तुम दौड़ते रहोगे… दौड़ ही रहा हू… और परमपिता परमेश्वर के घर में बैठकर वही से कामना करना कि एक ना एक दिन इस दौड़ में सफल हो पाऊ….। भगवान.. अश्विनीजी को अपने श्रीचरणों में स्थान दे… और जल्द ही किसी नए जन्म में हम सबके बीच प्रकट करे, यही कामना है।
