रतलाम की ख़बरें

स्मृति ही शेष .. अलविदा झा साहब ‘जस की तस धर दीन्ही चदरिया’

( अनिल पांचाल)
रतलाम। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक स्व.बालमुकुन्द जी झा ने जीवन में किसी तरह की अपेक्षा नही की थी। जीवन के अंतिम समय में भी उनकी देखभाल करने वाले स्वयं सेवकों ने उनकी अंतिम इच्छा जानना चाही तो वो कुछ नही बोले और श्रीराम का नाम जपते रहे थे। उन्हे कोई बीमारी विशेष नही थी, कभी कभार ब्लड प्रेसर ऊपर नीचे हो जाया करता था।
स्व.श्री झा ने संघ को जीवन के 56 साल दिए और इसमें से वे 25 साल तक रतलाम में ही रहे। रतलाम में इन्होने अपना पूरा कार्यकाल बेदाग छवि के साथ गुजारा। यही कारण था कि 50 प्रतिशत रतलामवासियों से इनका सम्पर्क रहा था।
स्व.श्री झा 1968 से संघ में सक्रिय थे, और ये वो दौर था जब संघ का चौ तरफा विरोध होता था। इसके बावजूद इन्होने संघ की रीतिनीति से जनता को जोड़ा और आज जो एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिल रहा है ये सब स्व.झा जैसे तपोनिष्ठ संघ सेवकों की मेहनत का ही परीणाम है।
आपातकाल के दौरान पूरे 19 माह तक पुलिस स्व.झा को तलाशती रही। इस दौरान स्व.झा साहब भेष बदल कर अमिताभ बच्चन की स्टाईल में भूमिगत रहे। लम्बे बड़े बाल, बैल बाटम आदि के माध्यम से ये रतलाम में कभी शर्मा तो कभी वर्मा बनकर संघ का कार्य करते रहे।
झा साहब के दर्शन मुझे लगभग 25 साल पहले हुए थे, जब वे नाहरपुरा स्थित आराम लाज के कक्ष में वरिष्ठ समाजसेवी स्व.श्री अमृतलालजी दख के साथ किसी विषय पर चर्चा कर रहे थे। हम उस समय दैनिक नवभारत के ब्यूरो चीफ ललित दख की देखरेख में पत्रकारिता किया करते थे। स्व.श्री अमृतलालजी दख व झा साहब का सम्पर्क करीब 40 साल पहले का रहा था। वे उनके साथ सेवा भारती के कार्यो में भी सक्रिय रहा करते थे।
स्व.अमृतलालजी दख, स्व.मांगीलालजी कटारिया, स्व.कैलाश बरमेचा, ग्रामीण क्षेत्रों के विधायक आदि के साथ झा साहब को अक्सर देखा जाता था। पैलेस रोड़, तपस्या भवन, आराम लाज और यादव रेस्टोरेंट (डालूमोदी बाजार) पर मुझे भी अक्सर उनके दर्शन हो जाया करते थे।
झा. साहब ग्रामीण व आदिवासी इलाकों में ज्यादा सक्रिय रहा करते थे। वर्षो पहले इसी दौरान ईशरथुनी और जामथुन रोड़ झा साहब ने एक मंदिर आदि निर्माण की इच्छा जताई तो उन्होने स्व.अमृतलालजी दख के सामने अपने इस इच्छा को जाहिर किया, जिस पर स्व.दख साहब ने भी बगैर किसी सोच विचार किए अपनी जमीन में से पांच बीघा जमीन सेवा भारती के इस पुनीत कार्य के लिए दान कर दी। यह स्थान आज भी है। उस समय कुछ समाज अन्य समाज के लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करते थे, वीरपाड़ा में सेवा भारती का यह स्थान स्थापित होने से इस तरह की गतिविधिया थम सी गई थी।
आज उनकी अंतिम यात्रा के दौरान उनके दर्शन के पुराने दृश्य भाव विभोर कर रहे थे। त्रिवेणी मुक्तिधाम पर स्व.श्री झा की चिता को मुखाग्नि,मुरैना से आए उनके भतीजे धन्नालाल झा और संघ के खण्ड संघचालक विक्रम पाटीदार (बिलपांक) ने दी। इस मौके पर हजारों संघ कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि आदि शामिल रहे।

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