ब्लैकमेंल: 200 रुपए दे वरना पुलिस से बोल दूगी.. इसने मेरे साथ वो किया . . .
शहर में सक्रिय है, शातिर महिलाओं की गेंग

रतलाम। पिछले कुछ महिनों से शहर की हर प्रमुख होटल, बाजार या अन्य भीड़ वालों इलाकों में कुछ महिलाएं छोटे बच्चों को गोद में उठाए नजर आती है, और आने-जाने वालों से खाने की वस्तु या रुपयों की मांग करती है। रतलाम वाले भी बड़े धर्मालु किस्म के पाए जाते है, ऐसे में महिलाओं का धंधा दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति पर है।
छोटे-छोटे बच्चों को लेकर सुबह से शाम तक बरसात, सर्दी और चिलचिलाती धूप में घुमने वाली इन महिलाओं की खबर पुलिस को छोड़ कर पूरे शहर और जिले वालों को है। क्या ये बच्चे इनके है ? ये कहां से आती है ? कहां रहती है ? इसकी जानकारी पुलिस किसी बड़े कांड होने के बाद लेगी ? ऐसा माना जा सकता है।
पिछले दिनों घास बाजार में चाट की दुकान लगाने वाले एक दुकानदार के पास एक मुंह पर कपड़ा लपेटे हुए महिला आई और साथ में एक बच्चे को भी लाई। कुछ समय ठेले के सामने खड़ा रहने के बाद महिला ने रुपए की मांग की। दुकानदार ने पांच-दस रुपए देने का विचार बनाया, मगर महिला तपाक से बोल पड़ी कि . . 200 रुपए दे ? दुकानदार ने जब कहां कि बई इतनी तो इन्कम ही नही है तो महिला धौस देते हुए बोली कि .. जल्दी से रुपए दे दे वरना थाने में जाकर बोल दूगी कि इसने में मुझे इशारा कर के कहां कि चल 500 रुपए दूगा, गली में आजा ।
यह सुन दुकानदार सन्न रह गया। महिला और दुकानदार के इस वार्तालाप को दुकानदार का बेटा सुन रहा था और उसने महिला को सबक सिखाने के लिए दो चार चांटे टिका दिए। महिला और चांटे पड़े तो कुछ लोग दौड़ कर आए और महिला को भाभीजी संबोधित कर समीप के थाने पर जाने की सलाह दे डाली। महिला भी थाने पहुच गई और काफी देर गहमागहमी का वातावरण निर्मित होता रहा।
दुकानदार ने जब इस महिला को लेकर छानबीन की तो पता चला कि आधा दर्जन से ज्यादा दुकानदारों को यह इसी तरह टोपी पहना चुकी है। सब को इज्जत प्यारी है, और ऐसों के कोई मुंह नही लगता जिसके सभी ग्रह बलवान होते है।
रतलाम बड़ा जंक्शन है, और भारत के कोने -कोने से कई बेंडे-डूंडे बड़ा स्टेशन देखकर यही उतर जाते है। इन दिनों शहर में बच्चों के साथ इधर उधर भटकने वाली महिलाओं में कुछ जावरा-बड़ावदा क्षेत्र की है तो कुछ स्थानीय निचली बस्तियों में निवास करती है। लोग इनसे परेशान है, मगर गोद में उठाए मासूम बच्चों को देखकर सहायता के लिए हाथ बढ़ा देते है। मगर इस सहायता के चक्कर में कितनों की फजीहत हो रही है, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए।
